कचरे से संसाधन एवं आय सृजन की दिशा में विद्यार्थियों को दिया व्यावहारिक प्रशिक्षण


देहरादून, 03 सितंबर 2026।
कृषि अपशिष्टों एवं जैविक अवशेषों के वैज्ञानिक एवं सतत प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण तथा अपशिष्ट से संसाधन एवं आय सृजन की संभावनाओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्लांटिका, देहरादून द्वारा EIACP Hub–उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (उत्तराखंड सरकार), देहरादून के प्रायोजन में चार दिवसीय व्यावहारिक कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया। कार्यशाला के अंतर्गत 31 अगस्त एवं 01 सितंबर 2026 को “Vermicomposting” तथा 02 एवं 03 सितंबर 2026 को “Sustainable Utilization of Fruit and Flower Biomass” विषयों पर प्रशिक्षण प्रदान किया गया।

इस चार दिवसीय कार्यशाला में HEC हरिद्वार, SGRR University देहरादून, Banda University of Agriculture and Technology (BUAT), बांदा, Geeta University, पानीपत तथा Graphic Era University, देहरादून से आए विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक प्रतिभाग किया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को जैविक अपशिष्टों के वैज्ञानिक प्रबंधन, वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन, फल एवं पुष्प अवशेषों के मूल्यवर्धन तथा पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों का व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करना था।
कार्यशाला के प्रथम दो दिनों में विद्यार्थियों को वर्मी कम्पोस्टिंग तकनीक के विभिन्न वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक पहलुओं से परिचित कराया गया। प्रशिक्षण के दौरान जैविक कचरे एवं कृषि अवशेषों के उचित प्रबंधन, वर्मी कम्पोस्टिंग यूनिट की स्थापना, उपयुक्त जैविक सामग्री का चयन, बेड तैयार करने की विधि, नमी एवं तापमान प्रबंधन, केंचुओं की उपयुक्त प्रजातियों एवं उनके पालन-पोषण, जैविक अवशेषों के विघटन तथा गुणवत्तापूर्ण वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने की प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।

विद्यार्थियों को केवल सैद्धांतिक जानकारी ही नहीं दी गई, बल्कि उन्हें हैंड्स-ऑन प्रशिक्षण के माध्यम से वर्मी कम्पोस्टिंग यूनिट की स्थापना एवं प्रबंधन की प्रक्रिया का प्रत्यक्ष अनुभव भी कराया गया। प्रशिक्षण के दौरान तैयार वर्मी कम्पोस्ट की गुणवत्ता, परिपक्वता की पहचान, संग्रहण एवं पैकेजिंग तथा कृषि एवं बागवानी में इसके उपयोग पर भी चर्चा की गई।
विशेषज्ञों ने बताया कि वर्मी कम्पोस्टिंग घरेलू जैविक कचरे, कृषि अवशेषों तथा अन्य जैव-अवक्रमणीय पदार्थों के वैज्ञानिक प्रबंधन का एक प्रभावी एवं पर्यावरण-अनुकूल माध्यम है। इसके माध्यम से न केवल कचरे की समस्या को कम किया जा सकता है, बल्कि किसानों, युवाओं एवं ग्रामीण उद्यमियों के लिए कम लागत पर रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसर भी विकसित किए जा सकते हैं।

कार्यशाला के तीसरे एवं चौथे दिन “Sustainable Utilization of Fruit and Flower Biomass” विषय पर विशेष प्रशिक्षण आयोजित किया गया। इस दौरान विद्यार्थियों को फल एवं फूलों से उत्पन्न होने वाले जैव-अवशेषों को कचरे के रूप में फेंकने के बजाय उनका वैज्ञानिक एवं रचनात्मक उपयोग करने की विभिन्न तकनीकों से अवगत कराया गया।

प्रशिक्षण में फल एवं पुष्प अवशेषों का संग्रहण, पृथक्करण, प्राथमिक प्रसंस्करण, सुखाने, संरक्षण तथा मूल्यवर्धित उत्पादों के निर्माण से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर जानकारी दी गई। विद्यार्थियों को यह समझाया गया कि मंदिरों, फूल मंडियों, फल प्रसंस्करण इकाइयों, होटल एवं घरेलू गतिविधियों से निकलने वाले जैविक अवशेषों का उचित प्रबंधन कर उन्हें उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित किया जा सकता है।

प्रशिक्षण का विशेष जोर “Waste to Wealth” की अवधारणा पर रहा, जिसके अंतर्गत जैविक अपशिष्ट को पर्यावरणीय समस्या के बजाय आर्थिक अवसर के रूप में देखने की सोच विकसित करने पर बल दिया गया।
विद्यार्थियों को विशेष रूप से Circular Economy, Sustainable Agriculture, Waste Management, Entrepreneurship और Green Skills की अवधारणाओं से जोड़ा गया। प्रशिक्षण के माध्यम से उन्हें यह संदेश दिया गया कि कृषि एवं जैविक अवशेषों को समस्या के रूप में देखने के बजाय वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से उन्हें उपयोगी संसाधनों में बदला जा सकता है।

कार्यशाला का आयोजन प्लांटिका, देहरादून की टीम द्वारा किया गया। कार्यक्रम की Organizing Secretaries के रूप में सुश्री वंदना पेटवाल, Assistant Scientist एवं Centre Head, प्लांटिका तथा डॉ. पल्लवी चौहान, Senior Scientist, प्लांटिका ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कार्यशाला के Co-Organizing Secretaries के रूप में सुश्री अंजलि शर्मा, Technical Associate, प्लांटिका तथा श्री सूरज जोशी, Technical Associate, प्लांटिका ने प्रशिक्षण की विभिन्न व्यवस्थाओं, प्रतिभागियों के समन्वय एवं तकनीकी गतिविधियों में सक्रिय सहयोग प्रदान किया।
पूरे कार्यक्रम का आयोजन डॉ. अनूप बडोनी, Senior Scientist एवं Director, प्लांटिका के मार्गदर्शन एवं पर्यवेक्षण में किया गया। उन्होंने कार्यशाला के माध्यम से विद्यार्थियों में सतत कृषि, जैविक अपशिष्ट प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण तथा अपशिष्ट से संपदा निर्माण के प्रति जागरूकता विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
PLANTICA द्वारा आयोजित यह कार्यशाला पर्यावरण संरक्षण, कृषि अपशिष्ट प्रबंधन, कौशल विकास एवं उद्यमिता को एक साथ जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल रही। कार्यशाला ने विद्यार्थियों को यह समझने का अवसर प्रदान किया कि आधुनिक कृषि एवं पर्यावरण प्रबंधन में केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उत्पादन प्रक्रिया से उत्पन्न अवशेषों का वैज्ञानिक, आर्थिक एवं पर्यावरण-अनुकूल प्रबंधन भी आवश्यक है।
कार्यक्रम के सफल आयोजन से यह संदेश सामने आया कि “Waste to Wealth” तथा “Sustainable Utilization of Biomass” जैसी अवधारणाओं को उच्च शिक्षा, कृषि प्रशिक्षण एवं उद्यमिता विकास से जोड़कर युवाओं के लिए नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
चार दिवसीय कार्यशाला का समापन प्रतिभागियों के अनुभव साझा करने, प्रशिक्षण से प्राप्त सीख को अपने संस्थानों एवं समुदायों तक पहुंचाने तथा भविष्य में सतत कृषि एवं पर्यावरण संरक्षण से संबंधित गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी के संकल्प के साथ हुआ।